Sunday

तुम से क्या कहूँ मैं!

हर समय, हर बात,
तुम से क्या कहूँ मैं!

हर कोई, हर बात कह पाता नहीें है,
और हर आघात सह पाता नहीं है;
क्या करूँ मजबूर है जलयान मेरा,
हर लहर के साथ बह पाता नहीं है;
आज भी इस प्रश्न को लेकर उठा है, सिंधु में उत्पात,
तुम से क्या कहूँ मैं!

कौन जाने कब, कहाँ परिचय हुआ था?
एक नूतन सृष्टि का अभिनय हुआ था;
अनकहे, अनबू़झे वचनों की शरण में,
रूप के संग प्रीति का परिणय हुआ था;
कब बन्धा कंगन, कहाँ बाजी बधाई, कब गई बारात,
तुम से क्या कहूँ मैं!

एक पल भी कल्पना की गति न ठहरी,
साधना करते रहे थे, शब्द-प्रहरी;
तारकों ने सेज सपनों की सजा दी,
यामिनी को आ गई कब नीन्द गहरी;
कब तलक जागी प्रतीक्षा की पुजारिन, हो गया कब प्रात
तुम से क्या कहूँ मैं!

-बलवीर सिंह रंग

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