तुम्हें मैं क्या बताऊँ दोस्त तुम कितने दुलारे हो
मेरी आँखों के तारे हो मेरे दिल के सहारे हो
जहां में कौन है मेरा मैं जब भी सोचता हूँ ये
तुम्हारा अक्स ही मेरी नज़र में झिलमिलाता है
मैं होता हूँ कभी भी अनमना या फिर परेशां तो
तुम्हारा साथ मेरे वक़्त को तब खिलखिलाता है
जहां के इन अन्धेरों में चमकते तुम सितारे हो
मेरे हर दर्द से वाकिफ़ रहे हर वक़्त तुम ही तो
चुभा काँटा कभी पग में तुम्हीं ने तो निकाला है
मुझे ना बिखरने देते ज़माने की हवाओं से
कभी छप्पर उड़ा तूफ़ान में तुमने सँभाला है
मेरी भटकी हुई इस नाव के तुम ही किनारे हो
नहीं होता अकेला मैं किसी वीरान में तक भी
सदा तुम पास हो मेरे मुझे अहसास होता है
कभी जब नैन पट से ख़्वाब में तुम आ धमकते हो
समझ लो रात भर आनन्द का महारास होता है
मैं कर्ता हूँ मग़र हर कर्म के तुम ही इशारे हो
मिला कितनों से ही लेकिन नहीं वे याद रह पाये
बड़ा अचरज भरा मुझको लगा दुनिया का ये मेला
बने हमदर्द हमराही सफ़र में अनगिनत लेकिन
तुम्हारे बिन समझता स्वयं को कमज़ोर मण्डेला
मेरी ख़ुशियों के हो संसार जादू के पिटारे हो
- कैलाश मण्डेला
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