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मैं प्यासा भृंग जनम भर का।

मैं प्यासा भृंग जनम भर का।
फिर मेरी प्यास बुझाए क्या, दुनिया का प्यार रसम भर का
मैं प्यासा भृंग जनम भर का।

चन्दा का प्यार चकोरों तक, तारों का लोचन कोरों तक
पावस की प्रीति क्षणिक सीमित, बादल से लेकर मोरों तक
मधुऋतु में हृदय लुटाऊँ तो
कलियों का प्यार क़सम भर का
मैं प्यासा भृंग जनम भर का

महफ़िल में नज़रों की चोरी, पनघट का ढंग सीनाज़ोरी
गलियों में शीश झुकाऊँ तो, यह, दो घूँटों की कमज़ोरी
ठुमरी, ठुमके या ग़ज़ल छिड़े
कोठे का प्यार रक़म भर का
मैं प्यासा भृंग जनम भर का

ज़ाहिर में प्रीति भटकती है, पर्दे की रीति खटकती है
नयनों में रूप बसाओ तो, नियमों पर बात अटकती है
नियमों का आँचल पकड़ूँ तो
घूंघट का प्यार शरम भर का
मैं प्यासा भृंग जनम भर का

जीवन से है आदर्श बड़ा, पर दुनिया में अपकर्ष बड़ा
दो दिन जीने के लिए यहाँ, करना पड़ता संघर्ष बड़ा
संन्यासी बनकर विचरूँ तो
सन्तों का प्यार चिलम भर का
मैं प्यासा भृंग जनम भर का

-गोपाल सिंह नेपाली

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