Monday

चिट्ठियाँ

अक्षरों में ढलीं प्रीत में थीं पली
याद आने लगी फिर हमें चिट्ठियाँ

अंक में सुधि लिए नेह में अनमनी
कुछ महकती हुई पीर ले कुछ घनी 
प्रेम के रोग में अक्षरों की दवा
आह या वाह की द्वार आती हवा 
थार को ज्यों मिली प्रीति की बदलियाँ
याद आने लगी फिर हमें चिट्ठियाँ

नेह मधु में पगी हर्ष में थीं खरी
शस्य आशाओं को कर रही थीं हरी 
होठों की थी छुअन, देह की थी तपन
अश्रुओं की नमी थी हृदय की अगन 
थीं लहर पर लहर, पंक्तियाँ-पंक्तियाँ
याद आने लगी फिर हमें चिट्ठियाँ
 
इक बताशा कोई या कि गुड़ की डली
भाव का ज्वार ले इक नदी सी चली 
ज्यों महकता हुआ माँ का आँचल कोई
या कि बाबुल से लिपटा हुआ पल कोई 
छाँव-सी धूप-सी सर्दियाँ गर्मियाँ
याद आने लगी फिर हमें चिट्ठियाँ

एक काग़ज़ में सिमटी धरोहर बड़ी
डाकिये से मिली, एक पल में पढ़ी
फिर पढ़ी फिर पढ़ी खोलकर बोलकर
जाने क्या लिख दिया प्राण को घोलकर
बुलबुले-सी मिटी वर्षों की हिचकियाँ 
याद आने लगी फिर हमें चिट्ठियाँ

-कौशल कौशलेन्द्र

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