वंचना हँसते गुलाबों की
फिर हमें पहुँचा गयी जलते वनों तक
वंचना हँसते गुलाबों की
धुन्ध में डूबे नदी के घाट
गूंजी रात में आसावरी
देखती निर्जन महल को मौन
तिल-तिल छीजती बारादरी
बाल खोले घूमती अब खण्डहरों में
वासना बूढ़े नबाबों की
चुक गये सन्दर्भ, बाँचे कौन
गाकर अब अलावों पर कथा?
जानता है बस अकेला ताल
तुलसी और पीपल की व्यथा
नग्न ले आयी सड़क पर पीढ़ियों को
सर्जना सस्ती किताबों की
थक गये हैं जंग खाये तीर-
अब टूटी कमानों पर चढ़े
प्रश्न है, थामे पताका कौन?
पहले कौन रथ आगे बढ़े?
जीततीं भूखे सवालों से समर में
तृप्त सेनाएँ जवाबों की
~किशन सरोज
No comments:
Post a Comment