इस रेत को चट्टान बनाने का शुक्रिया
दामन सम्हाल कर मुझे चलना तो आ गया
ए काँटो,मेरी राह मेँ आने का शुक्रिया
वो रास्ते की धूल आसमाँ पे जा चढ़ी
ठोकर उसे जनाब,लगाने का शुक्रिया
आया था शौक़ बन के,दर्द बन के तू गया
आने का शुक्रिया, तेरे जाने का शुक्रिया
सत्यम थी,सुन्दरम थी अब शिवम भी हो गई
विष मेरी अस्मिता को पिलाने का शुक्रिया
नाचीज़ थी मधू उसे हस्ती बना दिया
बातेँ मेरे ख़िलाफ़ उड़ाने का शुक्रिया
~मधु चतुर्वेदी
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