Tuesday

दरगाह पे लोबान जला

तुम्हारे क़िस्से में दिल का मेरे मक़ान जला
लगा फ़क़ीर की दरगाह पे लोबान जला

अभी भी रात को बुढ़िया वो महक उठती है
न जाने कितने बरस पहले ज़ाफ़रान जला

वहां यूं देर शाम आग जली चूल्हे में
सुबह से शाम तलक पहले वो इन्सान जला

वहां कुरान था, गीता थी और क़समें थीं
अदालतों में मगर रोज़ ही ईमान जला

गवाह ख़ौफ़ से, रिश्वत से बेज़ुबान हुए
कई जहान जले जब भी इक बयान जला

सभी तो टांक के आये थे अपना चांद वहां
ज़रा बताओ तो किस किस का आसमान जला

-कैलाश सेंगर

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