मिट्टी के कच्चे रस्ते में
रथ के पहिये धँसे हुए हैं
पत्थर इतने उछले ऊपर, टूट गये हैं शीशे के घर
नफ़रत के तीखे नेज़ों से, छिदा हुआ मटमैला अम्बर
आओ! उगता सूरज बेलें
पूरब की आँखों मे अब भी घने अन्धेरे बसे हुए हैं
अफ़वाहों के अन्धड़ में ये, काग़ज़ जैसे शहर उड़े हैं
अपनेपन के पृृष्ठ फटे हैं, सिले हुए रिश्ते उधड़े हैं
आओ! टूटे तारे झेलें
देखें, क्या ये तार चान्द की सारंगी के कसे हुए हैं
बहुत हो चुका जुल्म उजाले पर इन अन्धियारी रातों का
झेल रही हैं शैशव से झोंपड़ियाँ हमला आघातों का
आओ! इन्हें गोद में ले लें
ये अनाथ दुधमुँहे गाँव काले सर्पोें के डसे हुए हैं
-कुमार शिव
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