Saturday

चान्दनी

बाल बिखराए हुए, चान्द का आइना लिये
झील में पाँव हिलाती रही गोरी लड़की
नीले पर्वत की तलहटी के अकेलेपन में
डुबकियाँ लेके नहाती रही गोरी लड़की

कारवां चल दिया, मैदान के तम्बू उखड़े
सांझ ओझल हुई, सूरज की लुकाटी पकड़े
अलविदा कहते हुए आँखों में आँसू भरकर
शाख पीपल की झुलाती रही गोरी लड़की

पीले मुरझाए जटा-जूटों को छितराए हुए
गाँव के बूढ़े नजूमी-सा लबादा ओढ़े
पेड़ बरगद का खड़ा उसकी हथेली पकड़े
रात भर हाथ दिखाती रही गोरी लड़की

कोई भी नाव नहीं, कोई शिकारा भी नहीं
रातरानी से महकती हुई धारा भी नहीं
अपने चान्दी से चमकते हुए नाखूनों से
साज लहरों का बजाती रही गोरी लड़की

मुस्कुराता हुआ बेफ़िक्ऱ-सा अल्हड़ बाँका
पेड़ के पीछे से इक छोकरा बादल झाँका
शर्म से लाल हुए अपने धुले चेहरे को
दोनों हाथों से छिपाती रही गोरी लड़की

-कुमार शिव

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