हो उठा पवन चंचल, झूलना झुलाने को
भौंरों ने दिशि-दिशि गूंज, बजाई शहनाई
आई सुहागिनी कोयल सोहर गाने को
शबनम ने स्नान कराया मोती के जल से
पहनाये आकर वस्त्र वसन्त बहारों ने
निशि ने आँजा काजल, उषा ने रचे होंठ
पठवाये खील-खिलौने चांद-सितारों ने
करुणा ने चूमा भाल दिया आशीर्वाद
पीड़ा ने शोधी राशि, प्रेम ने धरा नाम
जय हो वाणी के पुत्र -घोष कर उठी बीन
अम्बर उतरा आँगन में करने को प्रणाम
दर्शन ने भेंटी दृष्टि, भावना ने भाषा
सूरज ने आभा-ओज, नदी ने गति प्रवाह
सुन्दरता ने दर्पण, पूजाओं ने अर्चन
बन गया हृदय आकर ख़ुद ही सागर अथाह
कल्पना पकड़कर हाथ, साथ खेलने लगी
होने उन्मुक्त लगे रहस्य के दृढ़ कपाट
काँपने लगा अपवर्ग, सिहरने लगा स्वर्ग
न्योछावर हो-हो गयी मनुज-संस्कृति विराट
मिल गयी राग को देह, आँसुओं को वाणी
पा गया सत्य आकार, हो गया असत् क्षीण
निर्गुण बन गया सगुण, स्वरवती हुई वसुधा
हँस उठी प्रकृति, ज्यों दीपक की बाती नवीन
फिर एक दिवस सोलह रत्नों का हार पहन
बाँसुरी बजाता निकला जब वह गीतकार
तरुणियाँ ठगी रह गयीं, गगरियाँ छलक पड़ीं
ज्यों बून्द बहक जाए छू पुरवाई बयार
बदली, लट गूँथ न सकी, देख श्यामल कुन्तल
मुस्कान निरख बिजलियाँ कौंधना गयीं भूल
बिछ गयी चरण पर आकर धूप रजतवर्णी
जब खिसक देह से गया तनिक रेशम दुकूल
माताओं के उर उमड़ पड़े, मानो उनके
अन्तर का ही सारा ममत्व हो धरे देह
युवकों को लगा कि जैसे धरती का यौवन
बाँटता फिर रहा हो घर-घर सौजन्य स्नेह
बालक दौड़ने लगे पीछे होकर विमुग्ध
रवि का अनुमान, जिस तरह करता है प्रकाश
वृद्धों ने उठ-उठ कर शिर मंगल तिलक दिया
सावन का वन्दन करता है, ज्यों जेठ मास
सन्तों ने गीत सुना, मन में सोचने लगे
यह गीत कि या कोई नवयुग की गीता है
है शब्द-शब्द उपनिषद और श्रुति तान-तान
दर्शन तो जैसे उज्ज्वल गंग पुनीता है
पपिहे को डाह हुई, बोला सारा जीवन
कट गया पिया की ही मीठी मनुहारों में
पर जितना दर्द भरा स्वर है इस गायक का
ऐसा तो दर्द न देखा कभी पुकारों में
गुनगुना उठी उपवन की डाली से बुलबुल
उफ़! कैसा सम्मोहन है इसके गाने में
जी करता है दे डालूँ उम्र इसे अपनी
ऐसा गुलाब तो देखा नहीं ज़माने में
शरमाकर कहने लगा चांद पूनम वाला
कितनी प्यारी इसकी सपनीली चितवन है
होते ही आँखें चार, उठाते ही पलकें
बेमोल सदा को बिक-बिक जाता तन-मन है
राधा-सी जग की गली-गली झूमने लगी
तन्मय हो गया विश्व सारा, ज्यों वृंदावन
तन-पनघट सब बन गये एक नव बंसीवट
खिल उठे गीत-स्वर-छन्द कुसुम उपवन-उपवन
सब ओर हर्ष, किंचित विमर्श न रहा शेष
हो गये अस्त दुःख-दैन्य-दाह-तम-रोग-शोक
पर देख धरा का यह उत्कर्ष कीर्ति वैभव
जल उठा ईर्ष्या से सब का सब देवलोक
सोचने लगा कोई उपाय ऐसा, जिससे
पा सके न संसृति कभी कला का अमृतदान
जब कोई युक्ति न दिखी स्वयं तब ब्रह्मा ने
कर दिया एक दिन भू पर अणुयुग का विधान
जो लौहपुरुष है लिये हाथ में खड़ा वज्र
वह और नहीं कोई, विनाश का सहचर है
होने वाली है सफल स्वर्ग की कूटनीति
विज्ञान, कला से यदि न डालता भाँवर है
- गोपालदास 'नीरज'
भौंरों ने दिशि-दिशि गूंज, बजाई शहनाई
आई सुहागिनी कोयल सोहर गाने को
शबनम ने स्नान कराया मोती के जल से
पहनाये आकर वस्त्र वसन्त बहारों ने
निशि ने आँजा काजल, उषा ने रचे होंठ
पठवाये खील-खिलौने चांद-सितारों ने
करुणा ने चूमा भाल दिया आशीर्वाद
पीड़ा ने शोधी राशि, प्रेम ने धरा नाम
जय हो वाणी के पुत्र -घोष कर उठी बीन
अम्बर उतरा आँगन में करने को प्रणाम
दर्शन ने भेंटी दृष्टि, भावना ने भाषा
सूरज ने आभा-ओज, नदी ने गति प्रवाह
सुन्दरता ने दर्पण, पूजाओं ने अर्चन
बन गया हृदय आकर ख़ुद ही सागर अथाह
कल्पना पकड़कर हाथ, साथ खेलने लगी
होने उन्मुक्त लगे रहस्य के दृढ़ कपाट
काँपने लगा अपवर्ग, सिहरने लगा स्वर्ग
न्योछावर हो-हो गयी मनुज-संस्कृति विराट
मिल गयी राग को देह, आँसुओं को वाणी
पा गया सत्य आकार, हो गया असत् क्षीण
निर्गुण बन गया सगुण, स्वरवती हुई वसुधा
हँस उठी प्रकृति, ज्यों दीपक की बाती नवीन
फिर एक दिवस सोलह रत्नों का हार पहन
बाँसुरी बजाता निकला जब वह गीतकार
तरुणियाँ ठगी रह गयीं, गगरियाँ छलक पड़ीं
ज्यों बून्द बहक जाए छू पुरवाई बयार
बदली, लट गूँथ न सकी, देख श्यामल कुन्तल
मुस्कान निरख बिजलियाँ कौंधना गयीं भूल
बिछ गयी चरण पर आकर धूप रजतवर्णी
जब खिसक देह से गया तनिक रेशम दुकूल
माताओं के उर उमड़ पड़े, मानो उनके
अन्तर का ही सारा ममत्व हो धरे देह
युवकों को लगा कि जैसे धरती का यौवन
बाँटता फिर रहा हो घर-घर सौजन्य स्नेह
बालक दौड़ने लगे पीछे होकर विमुग्ध
रवि का अनुमान, जिस तरह करता है प्रकाश
वृद्धों ने उठ-उठ कर शिर मंगल तिलक दिया
सावन का वन्दन करता है, ज्यों जेठ मास
सन्तों ने गीत सुना, मन में सोचने लगे
यह गीत कि या कोई नवयुग की गीता है
है शब्द-शब्द उपनिषद और श्रुति तान-तान
दर्शन तो जैसे उज्ज्वल गंग पुनीता है
पपिहे को डाह हुई, बोला सारा जीवन
कट गया पिया की ही मीठी मनुहारों में
पर जितना दर्द भरा स्वर है इस गायक का
ऐसा तो दर्द न देखा कभी पुकारों में
गुनगुना उठी उपवन की डाली से बुलबुल
उफ़! कैसा सम्मोहन है इसके गाने में
जी करता है दे डालूँ उम्र इसे अपनी
ऐसा गुलाब तो देखा नहीं ज़माने में
शरमाकर कहने लगा चांद पूनम वाला
कितनी प्यारी इसकी सपनीली चितवन है
होते ही आँखें चार, उठाते ही पलकें
बेमोल सदा को बिक-बिक जाता तन-मन है
राधा-सी जग की गली-गली झूमने लगी
तन्मय हो गया विश्व सारा, ज्यों वृंदावन
तन-पनघट सब बन गये एक नव बंसीवट
खिल उठे गीत-स्वर-छन्द कुसुम उपवन-उपवन
सब ओर हर्ष, किंचित विमर्श न रहा शेष
हो गये अस्त दुःख-दैन्य-दाह-तम-रोग-शोक
पर देख धरा का यह उत्कर्ष कीर्ति वैभव
जल उठा ईर्ष्या से सब का सब देवलोक
सोचने लगा कोई उपाय ऐसा, जिससे
पा सके न संसृति कभी कला का अमृतदान
जब कोई युक्ति न दिखी स्वयं तब ब्रह्मा ने
कर दिया एक दिन भू पर अणुयुग का विधान
जो लौहपुरुष है लिये हाथ में खड़ा वज्र
वह और नहीं कोई, विनाश का सहचर है
होने वाली है सफल स्वर्ग की कूटनीति
विज्ञान, कला से यदि न डालता भाँवर है
- गोपालदास 'नीरज'
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