क्या मिला आखि़र जलाकर आशियां
राख होकर रह गईं ख़ुद बिजलियाँ
बन गईं जब-जब चुनौती आन्धियाँ
और तेज़ी से बढ़ा है कारवाँ
हम भी हैं माने हुए हाज़िरजवाब
ज़िन्दगी है ग़र निरन्तर इम्तिहां
इक नदी से दोस्ती क्या हो गई
कितने सागर आ गए हैं दरमियाँ
दुश्मनों तक से निभाई दोस्ती
नाम ही है देश का हिन्दोस्तां
पाँव के नीचे हो राही ग़र ज़मीं
आदमी चाहे तो छू ले आसमां
-बालस्वरूप राही
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