इन पथरीले वीरान पहाड़ों पर
ज़िन्दगी थक गयी है चढ़ते-चढ़ते
क्या इस यात्रा का कोई अन्त नहीं
हम गिर जाएंगे थककर यहीं कहीं
कोई सहयात्री साथ न आएगा
क्या जीवन भर कुछ हाथ न आएगा
क्या कभी किसी मंजिल तक पहुँचेंगे
या बिछ जाएंगे पथ गढ़ते-गढ़ते
धुन्धुआती हुई दिशाएँ, अंगारे
ये खंडित दर्पण, टूटे इकतारे
कहते- इस पथ में हम ही नए नहीं
हम से आगे भी कितने लोग गए
पद-चिह्न यहाँ ये किसके अंकित हैं
हम हार गए इनको पढ़ते-पढ़ते
-बालस्वरूप राही
No comments:
Post a Comment