लोग
आपको उतना ही जानेंगे
जितना उनकी सोच
और समझ का
दायरा होगा
उतना ही देखेंगे
जितना दिखता है
या दिखाया जाता है
सब अधूरा जानते हैं
और बना लेते हैं
आपके बारे में
अपनी राय
सच तो ये है
यहाँ कोई किसी को
नहीं जानता
सिर्फ़ जताता है
कि वो जानता है
हमको हमसे बेहतर
भला कोई जान भी
कैसे सकता है
और जो किसी ने नहीं जाना
वही तो हैं हम
दरअस्ल हम जो हैं
सिर्फ़ हमीं जानते हैं
या हमारा ख़ुदा
तो फिर क्यूँ लोगों की सोच से
ख़ुद को जस्टिफाई करें
क्या फ़र्क़ पड़ता है
लोग हमें क्या जानते हैं
कैसा जानते हैं
कितना जानते हैं
फ़र्क़ पड़ता है
हम ख़ुद को क्या
और कितना जानते हैं
लोग तो लोग हैं
लोग ही रहेंगे
हम हम हैं
हम ही रहेंगे
जो किसी के भी लिए
जानना शेष है
वही तो विशेष है
वही है हमारा व्यक्तित्व
वही है हमारा अस्तित्व
और वही हैं "हम"
- कविता 'किरण'
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