दो बाँहें शाहजहां की है, दो बहियाँ है मुमताज़ की
इसके स्फटिक धवल आंगन में ऋतु बसन्त आया है,
लगता है भू पर जन्नत का नूर उतर आया है
इसके स्वर्ण खचित गुम्बद में मणियाँ बोल रही हैं,
फव्वारों के पास स्वर्ग की परियाँ डोल रही है
जमुना के उस पार देखती हैं शोभा महताब की,
दो आँखें शाहजहां की है, दो अँखियाँ हैं मुमताज़ की
इसके एक ओर उन्नत है बादलगढ़ गर्वीला
इसके एक ओर अवनत है, भोजमहल का टीला
मानसिंह, जसवंत सिंह की छतरी खड़ी हुई हैं
अग्रराष्ट्र की कुलकृतियाँ यमुना में पड़ी हुई हैं
दो घाटों की ओर निगाहें जाती हैं इतिहास की
दो राहें शाहजहां की हैं, दो पगध्वनियाँ मुमताज़ की
इसके अलसाये चेहरे के पास एक सूरज है
एक ओर जमना का जल है, एक ओर ब्रजरज है
गोरे-गोरे मुख पर पूरणमासी सजी हुयी है
इसके माथे सुखऱ् कमल की बिन्दिया लगी हुयी है
कुछ कहने-सुनने को आकुल हैं रसरतियाँ लाज की
दो बातें शाहजहां की हैं, दो बतियाँ हैं मुमताज़ की
-शिवसागर शर्मा
लगता है भू पर जन्नत का नूर उतर आया है
इसके स्वर्ण खचित गुम्बद में मणियाँ बोल रही हैं,
फव्वारों के पास स्वर्ग की परियाँ डोल रही है
जमुना के उस पार देखती हैं शोभा महताब की,
दो आँखें शाहजहां की है, दो अँखियाँ हैं मुमताज़ की
इसके एक ओर उन्नत है बादलगढ़ गर्वीला
इसके एक ओर अवनत है, भोजमहल का टीला
मानसिंह, जसवंत सिंह की छतरी खड़ी हुई हैं
अग्रराष्ट्र की कुलकृतियाँ यमुना में पड़ी हुई हैं
दो घाटों की ओर निगाहें जाती हैं इतिहास की
दो राहें शाहजहां की हैं, दो पगध्वनियाँ मुमताज़ की
इसके अलसाये चेहरे के पास एक सूरज है
एक ओर जमना का जल है, एक ओर ब्रजरज है
गोरे-गोरे मुख पर पूरणमासी सजी हुयी है
इसके माथे सुखऱ् कमल की बिन्दिया लगी हुयी है
कुछ कहने-सुनने को आकुल हैं रसरतियाँ लाज की
दो बातें शाहजहां की हैं, दो बतियाँ हैं मुमताज़ की
-शिवसागर शर्मा
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