बिखरे रंग तूलिकाओं से, बना न चित्र हवाओं का
इन्द्रधनुष तक उड़कर पहुँचा, सौन्धा इत्र हवाओं का
जितना पास रहा जो, उसको उतना ही बिखराव मिला
चक्रवात-सा फिरा भटकता, बनकर मित्र हवाओं का
कभी गर्म लू बनी जेठ की, कभी श्रावणी पुरवाई
फूल देखते रहे ठगे-से, ढंग विचित्र हवाओं का
परिक्रमा वेदी की करते, हल्दी लगे पाँव काँपे
जल भर लाया कहीं दृगों में, धुआँ पवित्र हवाओं का
कभी प्यार से माथा चूमा, कभी रूठ कर दूर हटीं
भोला बादल समझ न पाया, त्रिया-चरित्र हवाओं का
-किशन सरोज
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