Saturday

क़िस्मत के उलझे धागे सुलझाओ समय

क़िस्मत के उलझे धागे सुलझाओ समय
कभी किसानों की पीड़ा भी गाओ समय

राजाओं की चरण-वन्दना तुमने निशदिन गाई
सत्तालोलुप महाठगों की करते रहे बड़ाई
तनिक प्रजा के हिस्से में भी आओ समय
कभी किसानों की पीड़ा भी गाओ समय

मिट्टी को सोना करने में, देह गलाता सारी
उस सोने को मिट्टी की क़ीमत देता व्यापारी
व्यापारी को कभी खेत में लाओ समय
कभी किसानों की पीड़ा भी गाओ समय

बिटिया के विवाह की तिथियाँ पाला निगल गया है
राहत-राशि नेताजी का साला निगल गया है
भ्रष्टतन्त्र को कोई सबक़ सिखाओ समय
कभी किसानों की पीड़ा भी गाओ समय

बैंक मैनेजर कुरकी का आदेश लिये फिरता है
बिजली का बिल आसमान की बिजली-सा गिरता है
जैसे भी हो इसके प्राण बचाओ समय
कभी किसानों की पीड़ा भी गाओ समय

ख़ून-पसीने की रोटी पर नज़र गड़ी है सबकी
इसकी चिन्ता नहीं किसी को, इसे पड़ी है सबकी
इसके दुःख की गठरी कभी उठाओ समय
कभी किसानों की पीड़ा भी गाओ समय

- प्रमोद पवैया

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