लड़खड़ाते सत्य के संकल्प के अंगद चरण
चढ़ रही है फिर कसौटी पर विभीषण की शरण
आसुरी उद्घोष करते हैं दशानन के दसों मुख
युद्ध को ललकारते, हुंकारते सन्नद्ध सम्मुख
चीखता है आज सरयू तीर है, है रावणरथी
हार मत जाना विरथ रघुवीर, रावण है रथी
धर्म-भाषा-प्रान्त की ये भेदवादी योजनाएँ
ये स्वयं से ही स्वयं को तोड़ने को घोषणाएँ
कामना सिंहासनों की, सामने है स्वर्ण लंका
संकटों से त्रस्त है सम्मान रघुकुल के वचन का
लिख रहे सब देश की तक़दीर, रावण है रथी
हार मत जाना विरथ रघुवीर, रावण है रथी
हो गए थे धन्य उस दिन राम जब आकर मिले
और भीलों से, किराटों से, निषादों से गले
देखते हम देश की तरुणाइयों के शव जले
राजपथ पर रथ अवर्णों के सवर्णों के चले
रामसेना के पगों ज़ंजीर, रावण है रथी
हार मत जाना विरथ रघुवीर, रावण है रथी
मेघनादी अस्त्र से मूर्च्छित हुए भाई पड़े
अट्टहासी भंगिमा लेकर दशानन हैं खड़े
है हमें विश्वास मन रामत्व से भर जाएगा
फिर कोई हनुमान ले संजीवनी आ जाएगा
हम पढ़ेंगे मात्र मन की पीर, रावण है रथी
हार मत जाना विरथ रघुवीर, रावण है रथी
जड़ अहल्या-सी शिला पाषाण से चेतन हुई
सृजन का संकल्प लेकर राम जब तुमने छुई
परम चेतन राम तुम जड़ हो नहीं सकते कहीं
तुम किसी दीवार या मीनार के बन्दी नहीं
तुम कहाँ हो प्रश्न है गम्भीर, रावण है रथी
हार मत जाना विरथ रघुवीर, रावण है रथी
-बशीर अहमद मयूख
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