तुमने छोड़ा शहर
धूप दुबली हुई
पीलिया हो गया है अमलतास को
बीच में जो हमारे ये दीवार थी
पारदर्शी इसे वक़्त ने कर दिया
शब्द तुम ले चलीं गुनगुनाते हुये
मैं सम्भाले रहा रिक्त ये हाशिया
तुमने छोड़ा शहर
तम हुआ चम्पई
नीन्द आती नहीं है हरी घास को
अश्वरथ से उतर कर रुका द्वार पर
पत्र अनगिन लिये सूर्य का डाकिया
फिर मेरा नाम लेकर पुकारा मुझे
दूरियों के नियम फेंककर चल दिया
तुमने छोड़ा शहर
उड़ रही है रुई
ढक रहे फूल सेमल के आकाश को
दौड़ता ही रहा अनवरत मैं यहाँ
तितलियों जैसे क्षण हाथ आये नहीं
ज़िन्दगी का उजाला छिपा ही रहा
दिन ने मुख से अन्धेरे हटाये नहीं
तुमने छोड़ा शहर
याद बन कर जुही
फिर से महका रही घर की वातास को
भीड़ के इस समन्दर में हम अजनबी
एक अदृश्य बन्धन में बन्ध कर रहे
जंगलों में रहे, पर्वतों में रहे
हम जहाँ भी रहे कोरे काग़ज़ रहे
तुमने छोड़ा शहर
नाव तट से खुली
शंख देखा किए रेत की प्यास को
-कुमार शिव
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