Saturday

ओ युवा-वर्ष के अधिकारी

बारूदी बादल उमड़ रहे
कितने वृन्दावन उजड़ रहे
ओ युवा-वर्ष के अधिकारी!
आकाश झुका दे धरती पर

धरती पर क्या, आकाश तलक
शंकित आतंक समाया है
बस होड़ लगी हथियारों की
यह रूप प्रलय का आया है
इस पतझर जैसे क्षण-क्षण में
मधुमास खिला दे धरती पर

तेरे यौवन का ज्ञान मुझे
तू स्वतन्त्रता का जाया है
यह तो शताब्दियों का तप है
जिसके फल तुझको पाया है
तू अपने ऊँचे करतब से
इतिहास लिखा दे धरती पर

भय-जन्मी सीमा में बन्दी
आँसू बहते हैं निर्जन में
जो जिजीविषा को जनती है
वह युवाशक्ति है जीवन में
इस भोगमुखी दुनिया को तू
संन्यास सिखा दे धरती पर

-मधुर शास्त्री

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