Monday

फिर किसी ने प्यार माँगा!

फिर हथेली की लकीरों ने नया आकार माँगा
फिर किसी ने प्यार माँगा!

फिर बिना पूछे नयन में बस गया है ख़्वाब आकर
रात सोई है किसी की याद का तकिया लगाकर
दिन निकलता है ज़रा कम, डूबती है साँझ थोड़ी
हो न हो, करने लगा है रोशनी से प्रेम दिनकर
चन्द्रमा ने चाँदनी का हाथ फिर इक बार माँगा!

आईने से फिर पुरानी दोस्ती बढ़ने लगी है
एक कमसिन बेल पथरीली डगर चढ़ने लगी है
हर लहर का ढंग कुछ बदला हुआ सा लग रहा है
अब किनारों के लिए मुश्किल नदी पड़ने लगी है
फिर दवा ने मर्ज़ की ख़ातिर नया बीमार माँगा!

फूल देकर कर गया है फिर हृदय पर चोट कोई
फिर किसी को ढूँढ़ने में आँख ने है नींद खोई
फिर महकते हैं गुलाबी चिठ्ठियों के स्याह अक्षर
फिर किसी की याद ने है ओढ़नी मेरी भिगोई
फिर हृदय देकर किसी ने प्राण का उपहार माँगा!

-मनीषा शुक्ला

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