Wednesday

सम्बन्धों की गन्ध

अनुबंधों की सूची वाले सम्बन्धों में गंध कहाँ।
बिना गंध की पांखुर वाले फूलों में मकरंद कहाँ।

शगुन, महूरत, पोथी, पत्री, चालें सभी सितारों की।
रहे बांचते हरदम हरकत, पल पल के अभिसारों की।
राहू द्वारे कहीं नहीं था, न केतु का दंश कहीं।
सारे शुभ एकत्र हुए थे, अपशगुनों का अंश नहीं।
लेकिन सीता-राम नहीं तो, रामायण के छंद कहाँ।

खोने और समाने वाली सरिताओं का संगम हो।
मन को मन से बाँध सके, उस मन का दृश्य विहंगम हो।
सौगंधों के अतल समन्दर न हों रेगिस्तान कभी।
चन्दन वन जो गुपचुप रोपे, खो न दें पहचान कभी।
लेकिन माहीवाल नहीं तो, सोहनी के तटबंध कहाँ।

कितने प्यालों में अमृत है, कितने खुद ही गरल हुए।
गरल पान कर अमर हुए वो, जो मीरा से सरल हुए।
सरल हुए वो तरल हो गए, तरल नहीं विच्छेद हुए।
इतने भंगुर हुए उन्ही के, हर सम्बन्ध अभेद्य हुए।
बिना राधिका के मोहन की वंशी में आनन्द कहाँ।

दीप सरीखे हों आँगन में, छत पर चंदा तारों से।
भोर महकते महुए से हों, संझा छौंक बघारों से।
कभी जेठ की दोपहरी से, फिर सावन की झाड़ियों से।
किसी कहानी की रूठी सी, फिर मुस्काती कड़ियों से।
अलगू-जुम्मन नहीं मिले तो, मुंशी जी के द्वंद कहाँ।

-मदन मोहन समर

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