हमने क़िस्मत ही ख़ूब पाई है
वस्ल का ख़्वाब है, जुदाई है
जल उठे फिर चराग़ यादों के
दिल के आँगन में रौशनाई है
लाख मजबूरियाँ गिनाए कोई
बेवफ़ाई तो बेवफ़ाई है
चुप रहूँ मैं तो बैठता है दिल
लब जो खोलूँ तो जगहँसाई है
जिस्म की क़ैद चार दिन है 'शजर'
ज़िन्दगी भर की फिर रिहाई है
-संदीप शजर
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