Monday

कल की तरह

मेरा हर आज भी गुज़रा है हर इक कल की तरह
ज़िन्दगी गुज़री है इक ख़्वाबे-मुसलसल की तरह

आज तन्हाई में फिर याद ग़मे-दिल आया
आज फिर बैठ के रोया हूं मैं पागल की तरह

तेरी दहलीज़ पे जलना ही मुक़द्दर ठहरा
तेरी दहलीज़ पे महका हूं मैं संदल की तरह

भूल कर देख मुझे धूप भरी दुनिया में
याद आऊंगा तुझे गांव के पीपल की तरह

मिस्ले आंसू मुझे आँखों से गिराने वाले
हूं तेरी आँख में फैले हुए काजल की तरह

अपनी तकदीर की वीरानियों को ओढ़े हुए
 तुझसे मैं दूर बहुत दूर हूं जंगल की तरह

ताज़ा ताज़ा सा तग़ज़्ज़ुल लिए 'पंकज' की ग़ज़ल
आ गई शाख़े-अदब पे नई कोंपल की तरह

-पंकज 'पलाश'

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