ये मैंने मर्ज़-ए-मुहब्बत जो पाल रक्खा है
कलेजा हाथ में समझो निकाल रक्खा है
बस एक बार तुझे देख लूँ तो मर जाऊँ
कज़ा को बस तेरी ख़ातिर ही टाल रक्खा है
जिसे भी देखिए मजबूर दिल के हाथों है
ज़रा-सी चीज़ ने करके कमाल रक्खा है
किसी ख़ुशी को न आने दिया क़रीब अपने
कुछ इस तरह ते'रे ग़म को संभाल रक्खा है
शजर पे लगते ही फल देखिए ज़माने में
हर एक शख़्स ने पत्थर उछाल रक्खा है
-पंकज अभिराज
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