Friday

अन्तिम आमन्त्रण

खुले रहेंगे इन पलकों के द्वार, चले आना
नींद के आने से पहले
चांद के जाने से पहले

इधर लोचनों में उमड़ा है आँसू का सागर
उधर तुम्हारे द्वार उठ रहे शहनाई के स्वर
अन्तिम दर्शन के हित अन्तिम बार चले आना
पालकी उठने से पहले
पीहर छुटने से पहले

पागल मन आकुल केवल तुमसे मिलने को है
और इधर जीवन का दीपक भी ढलने को है
जब तक तन में श्वासों की झंकार, चले आना
कारवां लुटने से पहले
आशियां मिटने से पहले

आज सभी साधों ने मिलकर तुम्हें पुकारा है
यों तो मेरा मन बचपन से ही बंजारा है
तुम्हें बुलाता बंजारे का प्यार चले आना
अंधेरा मिटने से पहले
बसेरा उठने से पहले

बिना भ्रमर के किसी कली का खिलना ही क्या है
पतझर में प्रेमी हृदयों का मिलना ही क्या है
बीत न जाये कहीं बसंत-बहार, चले आना
फूल के खिलने से पहले
धूल में मिलने से पहले

आज मरण शैया पर हैं मन की अभिलाषाएँ
फिर भी साथ न छोड़ रही हैं झूठी आशाएँ
द्वार खड़े चारों कहार तैयार, चले आना
श्वास के ढलने से पहले
चिता के जलने से पहले

-सुरेन्द्र मोहन मिश्र

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