मैं पीड़ा का राजकुँअर हूँ, तुम शहज़ादी रूपनगर की
हो भी गया प्यार हमें तो, बोलो मिलन कहाँ पर होगा
मीलों जहाँ न पता ख़ुशी का, मैं उस आंगन का इकलौता
तुम उस घर की कली, जहाँ नित होंठ करें गीतों का न्यौता
मेरी उमर अमावस काली, और तुम्हारी पूनम गोरी
मिल भी गयी राशि अपनी तो, बोलो लगन कहाँ पर होगा
मेरा कुर्ता सिला दुःखों ने, बदनामी के काज निकाले
तुम जेा आँचल ओढ़े, उसमें नभ के सब तारे जड़ डाले
मैं केवल पानी ही पानी, तुम केवल मदिरा ही मदिरा
मिट भी गया भेद तन का तो, मन का हवन कहाँ पर होगा
मैं जन्मा इसलिये, कि थोड़ी उम्र आँसुओं की बढ़ जाये
तुम आयीं इस हेतु कि मेहँदी रोज़ नये कंगन जड़वाये
तुम उदयाचल, मैं अस्ताचल, तुम सुखान्तकी, मैं दुःखान्तकी
जुड़ भी गये अंक अपने, तो रस अवतरण कहाँ पर होगा
इतना दानी नहीं समय, जो हर गमले में फूल खिला दे
इतनी भावुक नहीं ज़िन्दगी, हर ख़त का उत्तर भिजवा दे
मिलना अपना सरल नहीं है, फिर भी यह सोचा करता हूँ
जब न आदमी प्यार करेगा, जाने भुवन कहाँ पर होगा
-गोपालदास नीरज
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