जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो
क़ब्र-सी मौन धरती पड़ी पाँव पर
शीश पर है क़फ़न-सा घिरा आसामां
मौत की राह में, मौत की छाँह में
चल रहा रात-दिन साँस का कारवां
जा रहा हूँ चला, जा रहा हूँ बढ़ा
पर नहीं ज्ञात है, किस जगह शाम हो
किस जगह पग रुके, किस जगह मग छुटे
किस जगह शीत हो, किस जगह घाम हो
मुस्कुराये सदा पर धरा, इसलिये
जिस जगह मैं झरूँ, उस जगह तुम खिलो
एक दिन काल-तम की किसी रात ने
दे दिया है मुझे प्राण का यह दीया
धार पर यह जला, पार पर यह जला
बार अपना हिया, विश्व का तम पिया
पर चुका जा रहा साँस का स्नेह अब
रौशनी का पथिक चल सकेगा नहीं
आन्धियों के नगर में बिना प्यार के
दीप यह भोर तक जल सकेगा नहीं
पर जले स्नेह की लौ सदा, इसलिये
जिस जगह मैं बुझूँ, उस जगह तुम जलो
रोज़ ही बाग़ में देखता हूँ सुबह
धूल ने फूल कुछ अनखिले चुन लिये
रोज़ ही चीख़ता है निशा में गगन-
‘क्यों नहीं आज मेरे जले कुछ दीये?’
इस तरह प्राण! मैं भी यहाँ रोज़ ही
ढल रहा हूँ किसी बून्द की प्यास में
जी रहा हूँ धरा पर, मग़र लग रहा
कुछ छिपा है कहीं दूर आकाश में
छिप न पाये कहीं प्यार पर, इसलिये
जिस जगहर मैं छिपूँ, उस जगह तुम मिलो
प्रेम का पन्थ सूना अगर हो गया
रह सकेगी बसी, कौन सी फिर गली
यदि खिला प्रेम का ही नहीं फूल तो
कौन है, जो हँसे फिर चमन में कली
प्रेम को ही न जग में मिला मान तो
यह धरा, यह भुवन सिर्फ़ श्मशान है
आदमी एक चलती हुई लाश है
और जीना यहाँ एक अपमान है
आदमी प्यार सीखे कभी इसलिये
रात-दिन मैं ढलूँ, रात-दिन तुम ढलो
दे दिया है मुझे प्राण का यह दीया
धार पर यह जला, पार पर यह जला
बार अपना हिया, विश्व का तम पिया
पर चुका जा रहा साँस का स्नेह अब
रौशनी का पथिक चल सकेगा नहीं
आन्धियों के नगर में बिना प्यार के
दीप यह भोर तक जल सकेगा नहीं
पर जले स्नेह की लौ सदा, इसलिये
जिस जगह मैं बुझूँ, उस जगह तुम जलो
रोज़ ही बाग़ में देखता हूँ सुबह
धूल ने फूल कुछ अनखिले चुन लिये
रोज़ ही चीख़ता है निशा में गगन-
‘क्यों नहीं आज मेरे जले कुछ दीये?’
इस तरह प्राण! मैं भी यहाँ रोज़ ही
ढल रहा हूँ किसी बून्द की प्यास में
जी रहा हूँ धरा पर, मग़र लग रहा
कुछ छिपा है कहीं दूर आकाश में
छिप न पाये कहीं प्यार पर, इसलिये
जिस जगहर मैं छिपूँ, उस जगह तुम मिलो
प्रेम का पन्थ सूना अगर हो गया
रह सकेगी बसी, कौन सी फिर गली
यदि खिला प्रेम का ही नहीं फूल तो
कौन है, जो हँसे फिर चमन में कली
प्रेम को ही न जग में मिला मान तो
यह धरा, यह भुवन सिर्फ़ श्मशान है
आदमी एक चलती हुई लाश है
और जीना यहाँ एक अपमान है
आदमी प्यार सीखे कभी इसलिये
रात-दिन मैं ढलूँ, रात-दिन तुम ढलो
-गोपालदास नीरज
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