Saturday

मैं कोई मेहमान नहीं हूँ!

साँसों का क्या ठौर-ठिकाना, कौन करे किसकी मेहमानी?
यहाँ किसी के दिन अपने हैं, और किसी की रात बिरानी।
अपनी-अपनी राह सभी की किसकी विदा, कहाँ का स्वागत?
रमते को जोगी कहते हैं, बहते को कहते हैं ’पानी’।
पतझर में बहार बान्धे हूँ, निर्जन हूँ, उद्यान नहीं हूँ
दूर करो या पास बुला लो, मैं कोई मेहमान नहीं हूँ!

कर लूंगा स्वीकार मरण को, घृणा तुम्हारी सह न सकूंगा
और व्यर्थ की सीमाओं में, रहना चाहूँ रह न सकूंगा;
अगर मूक-मन की भाषा को, पढ़ना तुम्हें नहीं आता तो-
तुम पूछो, चाहे मत पूछो, जो कहना है कह न सकूंगा;
तुम जैसे निष्ठुर-ठाकुर की पूजा हूँ, पाषाण नहीं हूँ
दूर करो या पास बुला लो, मैं कोई मेहमान नहीं हूँ!

शलभों की गतिविधि से परिचित, जैसे रहती जलन आग की;
मधुपों के अधरों तक आती, जैसे पावनता पराग की?
तुमसे मेरा ऐसा क्या है, बुरा न मानो तो बतला दूँ-
मेरी साँसों तक आई है, गन्ध तुम्हारे अंग-अंग की;
तुम गाओ, आलाप न समझूँ, इतना तो नादान नहीं हूँ!
दूर करो या पास बुला लो, मैं कोई मेहमान नहीं हूँ!

-बलवीर सिंह रंग

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