पतियाई हर शाख है, हरियाई हर डाल
इंद्र धनुष के बाण से, मारा गया अकाल
बीरबहूटी सज गई, सजी फूल की सेज
चुनरी धानी कर गया, कैसा वो रंगरेज
खेत हँसेंगे देखना, ले कोंपल की माल
इंद्रधनुष के बाण से, मारा गया अकाल
बूंदों के त्योहार में, जलते जुगनू दीप
स्वाति बूँद को खोजती, अंतस मन की सीप
हर किसान हर्षित हुआ, नाचे दे दे ताल
इंद्रधनुष के बाण से, मारा गया अकाल
हृदय धरा हरिया गई, सींच प्रेम का नीर
मन कुबेर सा हो गया, कल तक रहा फ़कीर
आओ जीमण में करें, लड्डू बाटी दाल
इंद्रधनुष के बाण से, मारा गया अकाल
- नरेंद्र दाधीच
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