Monday

प्रेम संदेशा

झंझावातों से गुजरा वो प्रेम संदेशा
मैं तुम तक ना पहुँचा पाया

फाड़ फाड़ कितने ही कागज
लिखा गया कितने सत्रों में
तेरे पल्लू की खुशबू थी
अब तक के सारे पत्रों में
लेकिन इसमें जो खुश्बू आ कर लिपटी थी
मैं तुम तक ना पहुँचा पाया

कितनी यादें, कितने सपने
हम दोनों ने साथ बुने थे
इक उपवन से फूल सलोने
साथ निहारे, साथ चुने थे
इस बसंत में उपवन में जो फूल खिले थे
मैं तुम तक ना पहुँचा पाया

उम्र हुई है, थके, सो गए 
बुने हुए वो सपने सारे
अम्बर से उतरा करते थे
तेरे मेरे आंगन तारे
वो तारा जो विगत रात छम से उतरा था
मैं तुम तक ना पहुँचा पाया

- नरेंद्र दाधीच

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