होली की हुड़दंगों का
तन-मन को जो रंग देते हैं
उन रंगीन प्रसंगों का
बस्ती-बस्ती चैराहों पर जमघट है अलबेलों का
हँसते-गाते धूम मचाते बहरुपियों के रेलों का
सड़कों पर से तीर चलाते रंग-बिरंगे छैलों का
छज्जे-छज्जे खोल किवड़ियाँ, मद में चूर गुलैलों का
यौवन की परिभाषा पढ़ने वाले मस्त मलंगों का
आया मौसम रंगों का
कब तक देवर बचता आख़िर, भाभी की रंगदारी से
बच न सके जब जीजाजी भी, साली की पिचकारी से
नणदोईजी घात लगाये बैठे थे तैयारी से
पर सलहज क्या कम थी, डामर पोत गई मक्कारी से
घूंघट में भी छिप न सकी जो, उन बेताब उमंगों का
आया मौसम रंगों का
गुस्सा होकर बोली बन्नो, यूँ अपने हमजोली से
रंगना हो तो रंग सिन्दूरी, मत रंग मुझको रोली से
भोला प्रेमी बोला, अपनी होने वाली भोली से
पहले ही ले जाऊंगा मैं तुझको अगली होली से
जल्दी ही आयेगा दिन शहनाई और मृदंगों का
आया मौसम रंगों का
कौन कहे मैं गोरा हूँ और कौन कहे तू काला है
किसके तन पर खद्दर है और किसके पास दुशाला है
होली की इस रुत ने सबको, इक रंग में रंग डाला है
सबने मिलकर इक-दूजे पर मन का सिंधु उछाला है
हर आगत का स्वागत करती निर्मल प्रेम तरंगों का
आया मौसम रंगों का
-हेमन्त श्रीमाल
No comments:
Post a Comment