Saturday

बुद्धिप्रकाश के दोहे

सूर मर्या, तुलसी मर्या, मर गा कैस्योदास
अब तो कवि-कुल में बच्या, कोरा बुद्धिप्रकास

बाबू बरणाँ सैं बण्यू, कवि-कुल को इतिहास
बाल्मीकि जी आदिकवि, अंतिम बुद्धिप्रकास

सदशिक्षा को हो गयो, बिल्कुल सत्यानास
एम ए तक जाणैं नहीं, कुण छै बुद्धिप्रकास

उपकुलपति की बुद्धि पर, हो कैयां बिस्वास
कोरस में भेळ्यो नहीं, अब तक बुद्धिप्रकास

ज्यूं नादर नैं नार अर नई बहू नैं सास
त्यूं साहित्यिक जगत् नैं सालै बुद्धिप्रकास

चुरा-चुरा कर चुटकुला, मिला-मिला अनुप्रास
बण बैठ्या कवि हास्य का, कविवर बुद्धिप्रकास

शासन करै समाज पर, गुण्डा अर बदमास
अनुशासन मैं पिस रह्या, सज्जन बुद्धिप्रकास

मनरंजन की चीज छै, चोपड़, सतरंज, तास
त्रैपनवां पत्ता बण्यां, कविवर बुद्धिप्रकास

बंसीबट पर कर रह्या, राधा-किस्सण रास
बण‘र घूघरा बज रह्या, कविवर बुद्धिप्रकास

अधरां पर आँसू खिलै, झरै नैण सैं हास
दरद पी’र उगलै हरख, वै कवि बुद्धिप्रकास

-बुद्धिप्रकाश पारीक

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