Saturday

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बन्धन की चाह हो

सपनों की ओस गूँथती कुश की नोक है
हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है
रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे
इस अन्धेर में कैसे नेह का निबाह हो
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बन्धन की चाह हो

उनका मन आज हो गया पुरइन पात है
भिगो नहीं पाती यह पूरी बरसात है
चन्दा के इर्द-गिर्द मेघों के घेरे
ऐसे में क्यों न कोई मौसमी गुनाह हो
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बन्धन की चाह हो

कुंकुम-सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है
बंसी की डोर बहुत काँप रही आज है
यों ही ना तोड़ अभी बीन रे सपेरे
जाने किस नागिन में प्रीत का उछाह हो!
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बन्धन की चाह हो

-बुद्धिनाथ मिश्र

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