अनगिन गीत जनम भर गाये
लेकिन ख़ुद रह गए अगाये
सुनते रहे व्यथा औरों की
अपने दर्द कहाँ कह पाये
हमने पूरी उम्र खपा दी जलकर पीर पराई में
इसीलिए तो चर्चित हैं हम अब भी लोकहँसाई में
हमसे मत पूछो दुनिया में क्या-क्या बुरा-भला देखा है
न्याय देवता के हाथों में हमने ख़ून लगा देखा है
चन्दा से उजले मुखड़ों पर भी काले धब्बे देखे हैं
हमने देवों की चादर पर भी पैबन्द लगे देखे हैं
जीभ काँपती है कहने में फिर भी लो तुमको बतलायें
सरस्वती के छद्म वेश में पुजती देखी हैं गणिकाएँ
इसीलिए तो आग रमाए घूम रहे कविताई में
-बलवीर सिंह ‘करुण’
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