Saturday

अपने दर्द कहाँ कह पाये

अनगिन गीत जनम भर गाये
लेकिन ख़ुद रह गए अगाये
सुनते रहे व्यथा औरों की
अपने दर्द कहाँ कह पाये
हमने पूरी उम्र खपा दी जलकर पीर पराई में
इसीलिए तो चर्चित हैं हम अब भी लोकहँसाई में

हमसे मत पूछो दुनिया में क्या-क्या बुरा-भला देखा है
न्याय देवता के हाथों में हमने ख़ून लगा देखा है
चन्दा से उजले मुखड़ों पर भी काले धब्बे देखे हैं
हमने देवों की चादर पर भी पैबन्द लगे देखे हैं
जीभ काँपती है कहने में फिर भी लो तुमको बतलायें
सरस्वती के छद्म वेश में पुजती देखी हैं गणिकाएँ
इसीलिए तो आग रमाए घूम रहे कविताई में

-बलवीर सिंह ‘करुण’

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