Sunday

अन्धा कुआँ

वह कौन चली आती पनघट से
सावन की अनबरसी बदली-सी भरी-भरी
यौवन के अहसान हज़ारों हैं जिस पर
पर लगती है सहमी-सहमी, डरी-डरी
कुछ बोल रही है मन ही मन
कुछ ओंठ काटती दाँतों से
और भीज गया पल्लू देखो
कुछ श्वेत कणों की पाँतों से
क्या रूप-सुहाना है इसका
क्या सुघड़-सलोनी लगती है
बेजोड़ कला उस ब्रम्हा की
शायद रति की पुनरुक्ति है

क्या कहा? अछूतों के मुखिया
उस रमुआ की घरवाली है?
यह पनघट से आई; फिर भी
इसकी गागर क्यों ख़ाली है?
अरे-अरे! यह रोती है
क्या वजह, बात आख़िर क्या है
इन हँसते-मुस्काते नयनों में
बेमौसम क्यों बरखा है?
क्या कहा ? इसे ललकार दिया
दुत्कार दिया, फटकार दिया
तू नीच वंश में जाई है
ये कहकर परे उतार दिया
क्या सवर्णों ने इसको देकर धक्के दूर हटाया है
पानी के बदले अपमानों का कड़वा ज़हर पिलाया है
नहीं-नहीं, नहीं-नहीं
यह झूठ बात
ठहरो, इससे ही पूछो-
”रो मत भाभी , सच बतला दे
क्या बीती है?”

वो कहती है- ”लाला!
वो जो बड़ा कुआँ है अमृत वाला
जिस पर आज सकल बस्ती के
बड़े लोग पानी भरते हैं
उसका मेरा रिश्ता है कुछ
ये तो पूछो क्या रिश्ता है
उस रोज़ कहाँ थे ये सारे
जब उसका नाम-निशान नहीं था
इस पनघट का पता नहीं था
पनिहारी का गान नहीं था
मैंने उठा कुदाल, नीर की आशा में
जब पहली चोट लगाई थी
और इस माटी से मुट्ठी भर
जब मैंने शीश चढ़ाई थी
कैसी-कैसी क़समें खाईं
इस यौवन में, तुम क्या जानों
इसका पानी पिये बिना
मैं नहीं तकूंगी मुख मुखिया का
तुम क्या जानो लाला!
इन कसमस करते दो बाजू से
मैंने ये निर्माण किया है
सौ-पचास मधु-यामिनियों का
न्योछावर बलिदान किया है
जब आई गीली मिट्टी
तो मेरी आँखें झरती थीं
मैं क्या जानूँ, मेरी आँखे
या प्रकृति कुएँ को भरती थी
पर इस अमृत की अंजुली पी
मैं शयन कक्ष के द्वार गई
महीनों के रूठे मुखिया को
मना-मना कर हार गई
मेरा मुखिया माना भी तो कब?
जब उसको विश्वास हो गया
कि मेरे श्रम से वो एक निपूता
पिता बन गया, बाप हो गया।
यह मेरे श्रम की साकार प्रतिष्ठा है
यह नहीं किसी को प्यास लिए लौटाएगा
ये मेरे मुखिया का बेटा है
बड़ा होकर ये उसका वंश चलाएगा
इसका मेरा ये रिश्ता है
बेशक़ इसने मेरी छाती छुई नहीं
और दूध भी पिया नहीं
लेकिन क्या मूल्य पसीने का
किसी दूध से कम है?
मुझे, पसीना मेरा ही, छूने पर बन्धन है
इसी बात का दुःख है मुझको
इसी बात का ग़म है
ये आँसू इसलिए नहीं कि
मुझे वहाँ शैतान मिला है
ये आँसू इसलिए नहीं कि
मुझे वहाँ अपमान मिला है
ये आँसू इसलिए नहीं कि
मुझको मारा-दुत्कारा है
ये आँसू इसलिए नहीं कि
मुझे वहाँ पर फटकारा है
लाला, ये आँसू इसलिए नहीं
की इस बस्ती का मन बिगड़ रहा है
ये आँसू इसलिए हैं
कि माँ से बेटा बरबस बिछड़ रहा है।
लाला! मैं, मेरा मुखिया, मेरा परिजन
बरसों प्यासे जी सकते हैं
इससे अधिक और भी कड़वा
ज़हर, हलाहल पी सकते हैं
पर मेरे आंगन तुलसी का एक बिरवा
और वक अभागिन कजरी गइया है
इन दोनों की प्यास नहीं देखी जाती है
वो देखो
तुलसी बिरवा मुरझाता है
वो देखो
कजरी रह-रह कर चिल्लाती है
वे राह देखते होंगे मेरी
और यहाँ ठीकरे रीते हैं।
लाला, वो मुझसे पानी मांगेंगे
वो नहीं पसीना पीते हैं
पर आज तुम्हारा ये समाज
इस दुखड़े को क्या समझेगा
और उसे मतलब भी क्या है
पर ठहर मेरी प्यासी कजरी!
ओ तुलसी बहना! धीरज धर
मैं आऊंगी गागर भरकर
लाला, तुम मुखिया से कहना!
मैंने फिर शपथ उठाई है
ढांढ़स देना मेरी कजरी को,
मेरी तुलसी को
और कहना
मैंने फिर कुदाल मंगवाई है
फिर मेरे बाजू फड़के हैं
फिर मुझे पसीना छूटा है
मुखिया के घर फिर थाली बजने वाली है
मुझको फिर से माँ बनना है
जिसका अमृत मैं आऊँ ग्रहण करके
और तुम्हारा ये समाज
ऐसा ही एक बेटा जनना है।
छोड़ो, छोड़ो रास्ता!
जाने भी दो
अब पीड़ा नहीं सही जाती है।”

और प्रसव की पीड़ा ले
सावन की अनबरसी बदली जैसी भरी-भरी
कहकर चली गई वो श्रम की देवी
मुझको सब कुछ खरी-खरी
देनी है उसको वो कुदाल
मुखिया से भी कुछ कहना है
उसकी कजरी को, उसकी तुलसी को
कुछ ठंडा ढांढ़स देना है
भगवान! मुझे कुछ शक्ति दो
क्यों पाँव नहीं उठते मेरे
ये काम मुझे करना होगा
और वो पूत जने उससे पहले
अन्धकूप ये छूत शास्त्र के बीहड़ का
उसी कुदाली की नोकों से
श्रम देवी की जय गुंजा कर
आज मुझे भरना होगा।

-बालकवि बैरागी

No comments:

Post a Comment