जिसमें प्रतिपल प्रति अक्षर है
शब्द मिनिट और पृष्ठ दिवस हैं
पीड़ाओं के संवत्सर हैं
जब होगा यह पूर्ण ग्रन्थ प्रिय
फिर तुम कैसे पढ़ पाओगी
सपनों की महफ़िल में सोएंगे
जा नभ में चांद-सितारे
पर मन में पीड़ा जागेगी
रह-रह आएंगे स्वप्न तुम्हारे
तुम न स्वप्न की रेखाओं से
मन को कभी हटा पाओगी
जाने वाली किरण अधखिले
फूलों को भी साथ लगा लो
जो उपहार दिये हैं तुमने
उन्हें गले का हार बना लो
कल्पवृक्ष के उन सुमनों से
कैसे जी को बहलाओगी
तुम न रहीं तो समझो मेरे
जीवन का इतिहास खो गया
तुम न रहीं तो समझो मेरा
रुदन जगा और हास खो गया
जलते हुए हृदय को कैसे
फिर शीतलता दे पाओगी
- सत्यदेव शास्त्री भौंपू
No comments:
Post a Comment