जिसमें मिला दो लगे उस जैसा
इस दुनिया में जीने वाले, ऐसे भी हैं जीते
रूखी-सूखी खाते हैं और ठण्डा पानी पीते
तेरी एक ही घूँट में मिलता जन्नत का आराम
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
भूखे की भूख और प्यास जैसा
गंगा से जब मिले तो बनता गंगाजल तू पावन
बादल से तू मिले तो रिमझिम-रिमझिम बरसे सावन
सावन आया, सावन आया, रिमझिम बरसे पानी
आग ओढ़कर आग पहनकर पिघली जाए जवानी
कहीं पे देखो छत टपकती, जीना हुआ हराम
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
दुनिया बनाने वाले रब जैसा
वैसे तो हर रंग में तेरा जलवा रंग जमाये
जब तू फिरे उम्मीदों पर तो रंग समझ ना आये
कली खिले तो झट आ जाये, पतझड़ का पैग़ाम
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
सौ साल जीने की उम्मीदों जैसा
-इन्द्रजीत सिंह तुलसी
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