प्राची के झिलमिल आंगन से मुक्ति-दिवस मुस्काता
जय हे भारत माता!
गंगा लेकर चली अर्घ्य-जल, यमुना लेकर फूल
सागर लेने चला उमड़कर जननी की पग-धूल
दीप लिए गंडकी पधारी, पद्मा गाती वन्दन
भारत माता के मन्दिर में आज जननी पद-पूजन
जननी खड़ी आरती ले रही, लिए खुले धन केश
क्षमा मांगती भूमि शिवा की, बुन्देलों का देश
स्वर भर्राया है कृष्णा का, उमड़ा अश्रु नयन में
इतना बड़ा देश पृथ्वी पर, पड़ा आज बंधन में
जननी पत्थर बनी निहारे, दासी का पद-पूजन
चुरा ले गई नीन्द दृगों की, ज़ंजीरों की झनझन
दबी हुई आवाज़ उठ रही, कुन्दन बढ़ता जाता
नवभारत के शान्ति गगन में अन्धड़ उड़ता जाता
जय हे भारत माता!
इस स्वर्गीय देश की शोभा हमको रुला रही है
नर प्रताप की भूमि सामने हमको बुला रही है
गौरी शंकर से गिरिवर के आज नयन में पानी
लौट रही भू पर विन्ध्या की बन्धन बन्धी जवानी
आज रामगिरि कालिदास का आँसू से मुँह धोता
छवि तुलसी की पंचवटी में, बन्धु भरत है रोता
नील नीलगिरी, श्याम श्याम-व्रज, गोदावरी सिहरती
कुचले हुए फूल पर जननी चलती मस्तक धरती
भारत के दक्षिण में देखो लहराता है सागर
और आज इस पुण्य देश कि रीती रस की गागर
यमुना-तट के तरु तमाल में कब से पतझड़ आई
देह-दहन की अग्नि प्रबल है, कुसुम-काली मुरझाई
उठते हुए सूर्य को क्षण-क्षण भारत देख रहा है
स्वर्ण किरण पर अपने तन के चिथड़े फेंक रहा है
आता है दिनमान, तिमिर की धज्जी आज उड़ाता
पेड़-पेड़ कारा में बन्दी, भारत नयन जुड़ाता
जय हे भारत माता!
सागर जननी की दो बाँहों पर मणिबन्ध बना है
आंगन पर रवि शशि-तारों का विमल-वितान तना है
हिमकिरीट डाले मस्तक पर प्रहरी है कैलास
नीचे समतल पर तरु-मरु पर कोटि-कोटि का वास
दुनिया में जिस राष्ट्र-वृक्ष को गंगा का जल सींचे
धूल-धूसरित जिसके पग पर सागर नीर उलीचे
जो जलते मरु के आतप में, वर्ष-वर्ष तपता हो
हाथों में हथकड़ी पहन, जो मुक्ति नाम जपता हो
उसका भाग्य लिए हाथों में तरुण ताकते मौक़ा
हिला न पाया उनको अब तक युगारम्भ का झोंका
जाग रहे जनपद बन्दी का बन्धन खलता जाता
जय हे भारत माता!
- गोपाल सिंह नेपाली
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