Sunday

कुछ तो कहिए

देश के बेरोज़गारों पर नज़्म कहिए
धोखा देने वाले अवतारों पर कुछ कहिए
आप युग के सूर, तुलसी, मीर, ग़ालिब हैं
भूख पर चैपाई, फ़ाक़ों पर ग़ज़ल कहिए

छन्द कहिए अपहरण की वारदातों पर
गीत लिखिए भूखे-नंगों की जमातों पर
कुछ तो कहिए ग़मज़दों की काली रातों पर
कुछ न कहिए ज़िन्दगी की आम बातों पर
मुफ़लिसी की नंगी लाशों पर ग़ज़ल कहिए

अब युवा आक्रोश पर पथराव पर कहिए भजन
देश की छाती के रिसते घाव पर कहिए ग़ज़ल
अस्मतों की डगमगाती नाव पर कहिए भजन
नज़्म लाठीचार्ज पर, घेराव पर कहिए ग़ज़ल
प्यार में छल, झूठे रिश्तों पर ग़ज़ल कहिए

कुछ तो कहिए गन्दी बस्ती में पले बदमाश पर
चुप ही रहिए, जीभ, जंघा, पेट के इतिहास पर
कुछ न कहिए धर्मनिष्ठा, त्याग और संन्यास पर
गीत लिखिए सत्य के विश्वास के वनवास पर
भूख से पथराई आँखों पर ग़ज़ल कहिए
बिन दवा के घुटती साँसों पर ग़ज़ल कहिए

-बेकल उत्साही

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