इन्सान बता इस धरती पर
कितने दिन तुझको जीना है
जिसको तू अपनी समझ रहा था
ख़ून इसी ने पीना है
आशिक़ हुए इस पर लोग सदा
पर ये न किसी पर हुई फ़िदा
लड़ मरे अनेकों शाह, गदा
मेरी-मेरी कहते-कहते
ये ऐसी अजब हसीना है
कोई उगता है, कोई डरता है
कोई रोता, कोई उछलता है
दिन-रात यही तो चलता है
रुकने पर तो विश्राम नहीं
ऐसा बेरोक सफ़ीना है
रंग इसके न्यारे-न्यारे हैं
रस कड़वे, मीठे, खारे हैं
सब खोज-खोज पर छारे हैं
पर पार तो पूरा पा न सके
जो इसके बीच दफ़ीना है
नागिन-सी जन-जन खाती है
फिर भी माता कहलाती है
मोह, ममता नहीं दिखाती है
ये चमक-दमक तो धोखा है
हीरा, विष भरा नगीना है
-बिहारी लाल हरित
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