Saturday

कितने दिन तुझको जीना है

इन्सान बता इस धरती पर
कितने दिन तुझको जीना है
जिसको तू अपनी समझ रहा था
ख़ून इसी ने पीना है

आशिक़ हुए इस पर लोग सदा
पर ये न किसी पर हुई फ़िदा
लड़ मरे अनेकों शाह, गदा
मेरी-मेरी कहते-कहते
ये ऐसी अजब हसीना है

कोई उगता है, कोई डरता है
कोई रोता, कोई उछलता है
दिन-रात यही तो चलता है
रुकने पर तो विश्राम नहीं
ऐसा बेरोक सफ़ीना है

रंग इसके न्यारे-न्यारे हैं
रस कड़वे, मीठे, खारे हैं
सब खोज-खोज पर छारे हैं
पर पार तो पूरा पा न सके
जो इसके बीच दफ़ीना है

नागिन-सी जन-जन खाती है
फिर भी माता कहलाती है
मोह, ममता नहीं दिखाती है
ये चमक-दमक तो धोखा है
हीरा, विष भरा नगीना है

-बिहारी लाल हरित

No comments:

Post a Comment