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भारत के सपने

तुम सवर्ण हो, अवर्ण हो तुम
तुम अर्जुन हो, कर्ण हो तुम
तुम ऊँच हो, नीच हो तुम
तुम आँगन, दहलीज हो तुम
तुम बहु, अल्पसंख्यक हो तुम
तुम धर्म हो, मज़हब हो तुम
कहने को तो,
नारों में भाई- भाई हो तुम
पर असलियत में
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई हो तुम!

और न जाने क्या-क्या तुम हो
सही मायने में
कुत्ते की दुम हो।

तुम कहते हो कि तुम
ग़रीब, असहाय और नंगे हो,
यह अलग बात है कि तुम
सिर्फ़ लड़ाई, झगड़े और दंगे हो।
तुम कहते हो कि तुम
जात-पाँत से ऊपर उठ कर
सुलझे हुए हो ,
ये अलग बात है कि तुम
आज तक भी
मन्दिर, मस्जिद, चर्च और
गुरुद्वारे में उलझे हुए हो।

तुम्हारी करतूतों ने
देश में
दुखड़े ही दुखड़े भर दिये हैं
तुम अपने-आपको
दूसरों से तो जोड़ते क्या
तुमने अपनी-अपनी
आस्थाओं के भी टुकड़े कर लिये हैं।

फिर भी कहते हो
कि तुम हरेक पल
देश और समाज की
प्रगति की फरियाद में हो ,
ये अलग बात है कि तुम
सब कुछ पहले हो
बस, हिन्दुस्तानी बाद में हो।

इसीलिए तो
तुम हो नहीं पाये
इन्सान से आदमी
आदमी से इंसा;
ईमान से धर्म
और धर्म से ईमान।

तुम चाहते हो
इस महावृक्ष की
शाख-शाख को काटो।
फिर मनचाहे अनुपात में
आपस में बाँटो।
क़द्र करने लायक तुम्हारे हौसले हैं
काटो, बाँटो पर सोचो
महावृक्ष की इन शाखों पर
कुछ और भी घोंसले हैं।

जिनमें
कल फिर
निर्माण यात्रा पर
निकल पड़नेवाले
सुस्ता रहे होंगे, सो रहे होंगे
सोते हुए भी रो रहे होंगे;
सँजोए हुए केवल यही डर,
उनकी जिंदगी भी
न जाने कब
हो जाए किसी बम का सफ़र।

क्या कहा ?
तुम्हें कोई याद नहीं
गांधी, सुभाष
ऊधमसिंह या अब्दुल हमीद,
तुम्हारी करतूतों पर
शर्मिन्दा होते
दिखाई नहीं देते, तुमको
अपने देश के
स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी और शहीद।

तो सुनो, मैं कहता हूँ-
मुझे अन्धा हो जाना चाहिए
यदि अपने देश में
रहनेवाले सब
मुझे अपने दिखाई नहीं देते
बेशक़, मेरा गला काटकर
शहर के किसी ख़ास चैराहे पर
लटका देना चाहिए
यदि मुझे
भारत में रहकर
भारत के सपने 
दिखाई नहीं देते।

-मक्खन मुरादाबादी

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