कैसे पहनूँ रे मनिहार, चूड़ी कैसे पहनूँ रे
मेरा बलम बेरोजगार चूड़ी कैसे पहनूँ रे
बालक-बलमा एक छत के नीचे सारे सौवें हैं
बलमा छेड़े, चूड़ी बाजे, बालक उठ रोवैं हैं
थाक्या हारा बलम बिचारा सोवै मन कू मार
तन पे मेरे फ़टे चीथड़े, तू कहै पहनूँ चूड़ी
बिन पैसे के एक सुहागिन हो गई रांड और रूड़ी
जिसपे पैसा उसकी इज़्ज़त, बाक़ी सब बेकार
रोटी की उलझन में उलझे कैसे शगुन विचारे
हाथ हथौड़ा लेके पत्थर तोड़े सड़क किनारे
माटी ही सिन्दूर हमारा, माटी ही सिंगार
बाबुल मेरा निर्धन, मैं भी निर्धन के ही ब्याही
काजल बन आँख्या में फैली इस ज़िन्दगी की स्याही
जब भी आवै तीर चुभावै ज़ालिम ठेकेदार
-रघुनाथ प्यासा
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