Saturday

ये शेख़-बिरहमन के झगड़े

हिंदू, सिख, पिछड़ेजन, सवर्ण
ये शेख़-बिरहमन के झगड़े
बरबाद न कर दें कहीं हमें
अपने घर-आंगन के झगड़े

जाने ये किसकी नज़र लगी, मुस्काना भूल गयीं कलियाँ
हँसना भूले मनचले फूल, गुंजन भूलीं भ्रमरावलियाँ
सहमे-सहमे से नगर-गाँव, भूले मेलों की रंगरलियाँ
पायल की रुनझुन भूल गए घायल बाज़ार, चैक, गलियाँ
सड़कों पर बूटों की आहट, बोझिल मौसम, गुमसुम पनघट
होंगे नानक व मोहम्मद से कब तक रघुनन्दन के झगड़े
बरबाद न कर दें कहीं हमें
अपने घर-आंगन के झगड़े

कुछ तुम भूलो, कुछ हम भूलें ईश्वर से करें प्रार्थनाएँ
सुलगें न और पंजाब, असम, अब जलें न और अयोध्याएँ
मन हों कबीर जैसे निर्मल, भाई-भाई फिर मिल जायें
जब कभी एक का हृदय दुखे, भर नयन दूसरे के आयें
महकें कश्मीरी अमराई, बादल संग घूमे पुरवाई
अब और न हों इस मधुबन में, फागुन से सावन के झगड़े
बरबाद न कर दें कहीं हमें
अपने घर-आंगन के झगड़े

गांधी-नेहरू के सपनों का भारत हो फिर से मूर्तिमान
मन्दिर में घण्टे बजें; पास ही मस्जिद में गूंजे अजान
हों सबके लिए पवित्र बाइबिल, गुरुवानी, गीता, क़ुरआन
पहले इन्सान बनें; फिर हिंदू, सिख, ईसाई, मुसलमान
ग़ैरों की चालें सफल न हों, भारत माँ के दृग सजल न हों
अनुयाई प्रजातंत्र के हम, फिर क्यों सिंहासन के झगड़े
बरबाद न कर दें कहीं हमें
अपने घर-आंगन के झगड़े

-किशन सरोज

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