मत पूछो किसी बच्चे से
मज़हब का नाम
उसे मज़हब नहीं,
दूध-रोटी की ज़रूरत होती है
भूखे बच्चे की मौत पर
किसी भी धर्म-ग्रन्थ के आँसू नहीं आते,
सिर्फ़ और सिर्फ़ माँ रोती है
माँ; जो रामायण बाँचती है
आयतों का जाप करती है
माँ; जो ईसा के पाँव छूती है
और गुरुवाणी का आलाप भरती है।
उस माँ की कोख़ के फूलों की ख़ुश्बू ने
जब कभी भी किया है
उसकी कोख़ का बँटवारा
इतिहास गवाह है
इस पर अफ़सोस करते हुए भी
माँ ने कभी किसी बेटे को नहीं मारा।
पर बेटे
माँ की गोद में लेटे
माँ की ही आत्मा काट रहे हैं
उसका दूध बाँट रहे हैं
इसलिए तुम
सिर्फ़ तुम
मरे हुए बछड़े की खाल में
पुआल मत भरो
माँ के नाम पर
अब किसी भी बच्चे से
मज़हब का सवाल मत करो
क्योंकि मज़हब के नाम पर
जब किसी बच्चे की
एक आँख हँसती
और एक आँख रोती है
तो सच कहती हूँ आपसे
माँ की कोख़ के बँटवारे की शुरुआत
यहीं से होती है।
-कमल मुसद्दी
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