सजाकर मेज़ पर तुमने जो ये गुलदान रक्खा है
गुलों पे ख़ौफ़ तारी है कि कब्रिस्तान रक्खा है
चमन में इस सियासत ने उगा दी नफ़रतें इतनी
गुलों ने एक दूजे को ही' दुश्मन मान रक्खा है
ये घर की रौनकें सारी हमीं से बस हमीं से हैं
कंगूरों ने हमेशा नींव पर एहसान रक्खा है
तुम्हें ये घर बदलने में बहुत तकलीफ तो होगी
किराएदार हो लेकिन बहुत सामान रक्खा है
चलो तोलें कमाई जिंदगी की हम तराजू से
उधर तुम दौलतें रख लो इधर ईमान रक्खा है
कई रस्तों से भेजा दूर, फिर भी लौट आते हैं
ग़मों ने घर हमारा ठीक से पहचान रक्खा है
अंधेरी कोठरी सी जिंदगी में घुट न जाए दम
ग़ज़ल का खूबसूरत एक रोशनदान रक्खा है
- प्रमोद वत्स
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