Wednesday

तम घना है

तम घना है इस अमावस की निशा के हर पहर का,
दीपको, तुम सो न जाना यह समय तो है समर का
इस परीक्षा की घड़ी से पार पाना है तुम्हें ही
जागना है फिर नया सूरज उगाना है तुम्हें ही

माना संकट है घना पर तुम भी ज्वाला- पुत्र ठहरे
सहते आये युग-युगों से काल के तुम घाव गहरे
थक नहीं सकते कभी भी, रुक नहीं सकते हो तुम
जाग कर देने हैं तुमको हर गली हर द्वार पहरे
निज चरण में काल का मस्तक झुकाना है तुम्हें ही

गाएंगे पंछी प्रभाती फिर नये गुंचे खिलेंगे
फिर से सरिता की लहर पर पर्ण पंकज के हिलेंगे
उत्सवों के गीत अधरों पर सजेंगे द्वार-द्वारे
नवसृजन के चिह्न धरती के हर इक पथ पर मिलेंगे
हर्ष के रंगों से धरती को सजाना है तुम्हें ही
जागना है फिर नया सूरज उगाना है तुम्हें ही

-पंकज 'पलाश'

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