एक बच्चे का खिलौना
बुझ चुके नयनो में बनकर
स्वप्न इक सुंदर सलोना
ठंड से ठिठुरे बदन पर घाम करना है
अब नहीं विश्राम करना है
एक जर्जर फूस का घर
क्यों भला बदहाल हलधर
पेट चिपका है कमर से
जी रहा है रोज मर मर
ग़र बदलनी है कहानी
हौसले रख आसमानी
और भी हैं दर्द कितने
कम पड़ेगी जिंदगानी
काम ये आठों पहर अविराम करना है
अब नहीं विश्राम करना है
पाँव में बेड़ी पड़ी हैं
हाथ पर भी हथकड़ी हैं
तोड़ने हैं चाँद तारे
बेटियाँ जिद पर अड़ी हैं
याचना से कौन देगा
रण करो फिर हक मिलेगा
मार,,,पूरा दम लगाकर
फूंक से पर्वत हिलेगा
आज फिर भीषण तुझे संग्राम करना है
अब नहीं विश्राम करना है
-प्रमोद वत्स
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