गुफ़्तगू के मस्त लहज़े तल्ख़ियों तक आ गए
बाँह थामे साथ मेरे जो चले थे हमसफ़र
वो कलाई से उतरकर उंगलियों तक आ गए
उफ़ हकीक़त ने किए हैं टुकड़े-टुकड़े इस क़दर
ख़्वाब चकनाचूर होकर किरचियों तक आ गए
डालकर पानी में कांटा उम्र भर बैठे फ़िज़ूल
इश्क पानी से किया बस मछलियों तक आ गए
पांव को छालों की लज़्ज़त इस क़दर अच्छी लगी
खुद ब खुद ही पांव चलकर बेड़ियों तक आ गए
हैं अधूरे बचपने के ख़्वाब दिल में अब तलक
ये लड़कपन से गुजरकर झुर्रियों तक आ गए
बागबाँ ने इश्क़ पर पहरा दिया तो ये हुआ
बन्दिशों को तोड़कर गुल तितलियों तक आ गए
दिल में' डूबे ख़्वाब अश्कों में ढले, फिर एक दिन
खुदकुशी करने पलक की खिड़कियों तक आ गए
खुलते-खुलते ग़म हमारे बेतकल्लुफ़ यूँ हुए
आप से तू, तू से फिर बेशर्मियों तक आ गए
-प्रमोद वत्स
आप से तू, तू से फिर बेशर्मियों तक आ गए
-प्रमोद वत्स
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