मुझको शिक़स्त-ए-दिल का मजा़ याद आ गया
तुम क्यों उदास हो गए क्या याद आ गया
कहने को ज़िन्दगी थी बड़ी मुख़्तसर मग़र
कुछ यूँ बसर हुई कि ख़ुदा याद आ गया
बरसे बग़ैर ही जो घटा घिर के खुल गई
इक बेवफ़ा का अहदे-वफ़ा याद आ गया
मांगेंगे अब दुआ कि उसे भूल जायें हम
लेकिन जो वो बवक़्त-ए-दुआ याद आ गया
हैरत है तुमको देख के मस्जिद में ऐ ख़ुमार
क्या बात हो गई कि ख़ुदा याद आ गया
-ख़ुमार बाराबंकवी
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