तू इक ज़रा सा इशारा तो कर गया होता
ते'रे लिए मैं हदों से गुज़र गया होता
मैं खोलता ही नहीं उम्र भर कभी आँखें
जो ख़्वाब बन के तू आँखों में भर गया होता
मैं एक पल के लिए भी अगर भुलाता तुझे
ये दिल धड़कता न रहता, ठहर गया होता
घिरा है गुल जो ये काँटों से, इसके हक़ में है
ये वरना टूट के कबका बिखर गया होता
जो होता नींद का कोई भी रिश्ता बिस्तर से
मैं यूँ भटकता न सड़कों पे, घर गया होता
अना का तीर चलाया था वक्त ने मुझपे
अगर मैं झुक नहीं जाता तो सर गया होता
ग़ज़ल ने मुझको सहारा दिया ख़ुदा का करम
ग़मों में डूब के वरना मैं मर गया होता
-पंकज अभिराज
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